Description
यह पुस्तक लोकनायक जयप्रकाश नारायण के व्यक्तित्व और जीवन का एक उत्कृष्ट चित्रण है, जिसे लेखिका इंदु बाला वर्मा ने प्रस्तुत किया है। वे जेपी की पितृ पक्ष की बुआ की पौत्री थीं—एक अत्यंत विदुषी महिला, जिन्हें जेपी के व्यक्तित्व के निर्माण तथा उनके बचपन से ही उनके जीवन पर गहरा प्रभाव डालने का श्रेय दिया जाता है।
इस पुस्तक का मुख्य आधार वह आठ पृष्ठों का पत्र है, जो नवविवाहिता प्रभावती देवी ने अपने पति को लिखा था। इस पत्र में उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र-निर्माण के उनके संकल्प में पूर्ण सहयोग देने की प्रतिज्ञा की थी।
यह पुस्तक लोकनायक के नारी-मुक्ति के प्रति समर्पण की एक ऐसी झलक प्रस्तुत करती है, जिसका व्यापक प्रचार तो नहीं हुआ, किंतु उनकी पत्नी प्रभावती ने उसे भली-भाँति स्वीकार और सराहा। प्रभावती, जो वर्धा के गांधी आश्रम में जाने से पूर्व जालंधर के कन्या पाठशाला की छात्रा थीं, ने इन शब्दों में अपनी भावना व्यक्त की—
“जब पश्चिमी देशों में (उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक) महिलाओं को केवल रसोई में केक बनाने तक सीमित कर दिया जाता था, और परिवार तथा अन्य महत्वपूर्ण मामलों के निर्णय केवल पुरुषों द्वारा लिए जाते थे, तब आप (जेपी) ऐसे व्यक्ति थे जो अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले अपनी पत्नी की राय पूछते हैं। यह केवल मेरे लिए, आपकी पत्नी होने के नाते, गर्व का क्षण नहीं है, बल्कि विश्व की सभी महिलाओं के लिए गर्व का विषय है। ईश्वर आपको सफलता प्रदान करे और आपको आशीर्वाद दे।”
इस प्रकार यह पुस्तक औपनिवेशिक भारत के उस पक्ष को भी उजागर करती है, जिसने भारतीय नारी-मुक्ति के उदय का शंखनाद किया था- – जिसे न तो पश्चिमी जगत ने मान्यता दी और न ही स्वाधीनोत्तर भारत ने पहचाना।








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